Wednesday, January 22, 2020

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020: किस चेहरे का कितना जादू चलेगा

चुनाव की दहलीज़ पर खड़ी दिल्ली को लेकर एक सवाल चर्चा में है- क्या कोई चेहरा इस बार चुनाव की चाल बदल सकता है?

ये वो सवाल है, जो अब आए दिन ट्विटर ट्रेंड में दिख रहा है और दोबारा सरकार बनाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी को खूब रास आ रहा है.

अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में ताल ठोक रही पार्टी का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के पास मौजूदा मुख्यमंत्री के मुक़ाबले कोई चेहरा नहीं है.

म आदमी पार्टी के नेता और तिमारपुर सीट से उम्मीदवार दिलीप पांडेय कहते हैं, "ये आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा एडवांटेज है. भारतीय जनता पार्टी के पास दिल्ली में न मुद्दे शेष हैं और न ही नेतृत्व बचा है."

दिल्ली की राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषक इस सवाल का जवाब आंकड़ों के आधार पर देते हैं. मौजूदा सदी यानी साल 2000 के बाद दिल्ली में हुए विधानसभा के चार चुनावों में से तीन में जीत का सेहरा चुनाव में अगुवाई करने वाले नेताओं के सिर पर सजा.

साल 2003 और 2008 में कांग्रेस ने शीला दीक्षित की 'विकासपरक' छवि के सहारे 47 और 43 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी के मंसूबों पर पानी फेर दिया. इस नतीजे के दम पर शीला दीक्षित ने दिल्ली में तीन बार मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया और पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार होने लगीं.

वहीं, साल 2015 में किरण बेदी पर भारी पड़े केजरीवाल ने पूरे ज़ोर पर दिखती नरेंद्र मोदी की चुनावी लहर को दिल्ली विधानसभा में दाखिल नहीं होने दिया. आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटें जीतने में कामयाब रही. 49 दिन की सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद सियासी वनवास की तरफ़ बढ़ गए केजरीवाल ने 2015 की जीत से भारतीय राजनीतिक पटल पर ज़ोरदार वापसी की.

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुने गए तीन विधायकों में से एक विजेंदर गुप्ता इन आंकड़ों को ज़्यादा महत्व नहीं देते हैं. गुप्ता का दावा है कि चुनाव के पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम का एलान नहीं करना पार्टी की रणनीति है.

वो कहते हैं, "हर पार्टी का एक चुनावी समीकरण और रणनीति होती है. पार्टी जो भी कर रही है, सोच समझकर कर रही है."

लेकिन, ये रणनीति कई विश्लेषकों को भारतीय जनता पार्टी की कमज़ोर कड़ी दिखती है. दिल्ली की राजनीति पर क़रीबी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं कि चेहरे का 'महत्व तो होता ही है और कोई चेहरा है तो उसे सामने लाया जाना चाहिए. जैसे किसी वक़्त कांग्रेस के पास शीला दीक्षित का चेहरा था. तब उनकी छवि बदलाव और विकास से जुड़ गई थी.'

प्रमोद जोशी की राय में ऐसे फ़ैसले वोटरों की सोच को भी प्रभावित करते हैं.

वो कहते हैं, "दिल्ली का वोटर किसी के पीछे चलने वाला नहीं है. वो चीज़ों को देखता रहता है और समय पर फ़ैसले लेता है."

चेहरे की अहमियत भारतीय जनता पार्टी को भी खूब समझ आती है. साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चेहरे ने पार्टी को विरोधियों पर निर्णायक बढ़त दिलाई.

इतना ही नहीं महाराष्ट्र में दशकों पुरानी सहयोगी शिवसेना के साथ गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, "ये मैंडेट (महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे) देवेंद्र फडणवीस और नरेंद्र मोदी के नाम पर आया था. शिवसेना का एक भी प्रत्याशी, इनक्लूडिंग आदित्य ठाकरे, ऐसा नहीं था जिसने मोदी जी का कटआउट शिवसेना के सारे नेताओं से बड़ा नहीं लगाया था."

शाह दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी को मात देने के लिए 'मोदी मैजिक' पर भरोसा कर रहे हैं. जनवरी के शुरुआती हफ़्ते में दिल्ली की एक रैली में उन्होंने कहा, "जहां पर भी मैं जाता हूं, वहां पूछते हैं, दिल्ली में क्या होगा? मैं आज आप सबके सामने जवाब दे देता हूं दिल्ली में नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने वाली है."

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने वाली भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख ने अपने दावे के समर्थन में तर्क भी दिया. अमित शाह ने अरविंद केजरीवाल की चुनौती को ख़ारिज करते हुए कहा, "झांसा कोई किसी को कोई एक ही बार दे सकता है. बार-बार नहीं दे सकता. दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आप पार्टी (आम आदमी पार्टी) का सूपड़ा साफ़ हो गया. 2019 के चुनावों में दिल्ली के 13750 बूथों में से 12064 बूथ पर भारतीय जनता पार्टी का झंडा फहराने का काम मेरे कार्यकर्ताओं ने किया. 88 प्रतिशत बूथों पर भारतीय जनता पार्टी ने विजय प्राप्त की है."

शाह का आकलन है कि बूथ कार्यकर्ताओं की मेहनत और मोदी का चेहरा साल 1998 से दिल्ली विधानसभा में बहुमत हासिल करने को तरस रही पार्टी की कसक मिटा सकता है.

विजेंदर गुप्ता भी ऐसा ही दावा करते हैं. वो कहते हैं कि लोगों को समझ आ गया है. दिल्ली के विकास को तेज़ गति बीजेपी दे सकती है. मोदी जी दिल्ली में विकास करना चाहते हैं. केजरीवाल सिर्फ़ दिल्ली को पीछे ले जाने का काम कर रहे हैं.

वो आगे कहते हैं, "दिल्ली में पीने का पानी साफ नहीं है. लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं. दिल्ली में प्रदूषण इतना है. पांच साल में सरकार ने इन दोनों मुद्दों पर कोई काम नहीं किया. हम दिल्ली में साफ पानी देंगे. साफ हवा दिल्ली की हो इसकी व्यवस्था देंगे. यूनिफ़ाइड ट्रांसपोर्ट सिस्टम लास्ट माइल कनेक्टिविटी के साथ देंगे."

दिल्ली के लोगों को मोदी के प्लान पर भरोसा है, ये दावा करते हुए वो कहते हैं, "जिस तरह से मोदी जी 1731 कॉलोनियों को मालिकाना हक़ दिया है, ये कोई साधारण बात नहीं है."

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के दावों को लेकर प्रमोद जोशी कई सवाल खड़े करते हैं.

वो कहते हैं, "नगर पालिका या नगर निगम के चुनाव अलग होते हैं. दिल्ली में राज्य के रूप में सफल होना है तो अलग रणनीति होनी चाहिए. पिछले कुछ समय से भारतीय जनता पार्टी किसी स्थानीय नेता को आगे नहीं कर पाई है. हो सकता है कि मनोज तिवारी कुछ इलाक़ों में बहुत लोगों को प्रभावित करते हों लेकिन उनके मुक़ाबले केजरीवाल आगे नज़र आते हैं. "

Thursday, January 9, 2020

कोटा: मासूम नवजातों की मौत का ज़िम्मेदार कौन- ग्राउंड रिपोर्ट

कोटा के जेके लोन अस्पताल से तक़रीबन अस्सी किलोमीटर दूर बारां गांव के अंतिम छोर पर बने एक हरे रंग के मकान में रहने वाले युवा दम्पति टोनू और रेखा गोंड़ के नवजात शिशु ने बीती 23 दिसंबर को अस्पताल में दम तोड़ दिया. मृत्यु के वक़्त रेखा और टोनू का बेटा सिर्फ़ तीन दिन का था.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

पिछले 36 दिनों में कोटा के जेके लोन अस्पताल में दम तोड़ने वाले 110 बच्चों में से वह भी एक था.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

पीले फूलों वाली लाल जुराबों, पुरानी साड़ी और हरी शॉल में सिमटी बैठी रेखा शुरुआती जनवरी की ठंड में ठिठुर रही थी. चेहरे पर गहरी उदासी चिपकी हुई थी.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

नवजात के बारे में पूछने पर कुछ देर के लिए शून्य में देखती रहीं. फिर मद्धम आवाज़ में बोलीं, "सिर्फ़ तीन दिन का था इसलिए नाम भी नहीं रख पाए थे. मेरे पास तो तीन दिन में से सिर्फ़ एक रात रहा. ठीक से देखा भी नहीं उसे. चेहरा भी याद नहीं".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

अपनी गर्भनाल से नौ महीने तक सींचने के बाद भी, अपने ही बेटे का चेहरा याद करने की कोशिश करती 21 वर्षीय रेखा के चेहरे पर दुख की गहरी लकीरें खिंच आईं थीं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

तभी उनके 21 वर्षीय पति टोनू ने अपने मोबाइल में मौजूद बेटे की एकलौती तस्वीर निकाल कर पत्नी और मेरे सामने रख दी.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

तीन किलो से ऊपर का मासूम नवजात बालक. मिचीं हुई घुंघराली पलकों पर रखा नाज़ुक गुलाबी हाथ.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

तीन दिनों के अपने छोटे से जीवन के दौरान इन बच्चे ने सिर्फ़ बारां ज़िला अस्पताल से कोटा के जेके लोन अस्पताल तक का सिर्फ़ एक ही सफ़र पूरा किया था. इसलिए माँ-बाप के पास एक-आध जो भी तस्वीर थी वो सभी अस्पतालों की ही थी.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

सीमेंट और मिट्टी में सनी अपनी खुरदुरी हथेलियों में अस्पताल से मिले बच्चे के इलाज की पर्चियाँ पकड़े टोनू कहते हैं, "नाम रखने का समय कहां मिला? पहले बारां के ज़िला अस्पताल में भाग-दौड़ करते रहे.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

फिर वहां से कोटा के अस्पताल का चक्कर लगा इसलिए हर जगह नाम 'बेबी ऑफ़ रेखा' ही लिखा है".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

टोनू देखने में 21 साल की अपनी उम्र से भी छोटे लगते हैं लेकिन कम उम्र में मिले गहरे दुखों ने उनके चेहरे पर अतीत की कठोर परछाई की तरह चिपके दिखाई देते हैं. दस लोगों के संयुक्त परिवार का पेट पालने के लिए रोज़ सुबह टोनू को अपने बड़े भाई के साथ मज़दूरी के लिए निकलना पड़ता है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

"यह हमारा पहला ही बच्चा था और हमने उसे बचाने की बहुत कोशिश की. पैदा होने के बाद से वो बहुत रोता था. पूछने पर डॉक्टर साहब ने कहा कि रोने से उसकी छाती खुल जाएगी और वो ठीक हो जाएगा लेकिन हालात तो बिगड़ती ही गई. फिर एक दिन बाद कोटा रेफ़र कर दिया उसे. वहां बच्चों के आइसीयू में रखा लेकिन धड़कन उसकी तेज़ चलने लगी और साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी. मैं पूछता रहा और डॉक्टर कहते रहे कि ठीक हो जाएगा बच्चा लेकिन वो तो देखते ही देखते गुज़र गया".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

मातम में बदली जन्मदिन मनाने की तैयारियाँ
"थमती नहीं ज़िंदगी किसी के बिना, लेकिन ये गुज़रती भी तो नहीं अपनों के बिना.." - यह है 24 दिसम्बर को कोटा के जेके लोन अस्पताल में अपने डेढ़ साल के बच्चे को खो देने वाले पिता सागर सिंह का व्हाट्सऐप स्टेटस. साथ में तीन पहिए वाले क्रॉलर के सहारे चलने की कोशिश करते बेटे भरत सिंह की एक मासूम प्यारी सी तस्वीर.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

टोनू के गांव से तक़रीबन पंद्रह किलोमीटर दूर बारां शहर के बाबजी नगर में रहने वाले सागर का घर आज भी उनके उदासी में डूबा है. भरत सेक्योरिटी गार्ड के तौर पर काम करने वाले अपने पिता का एकलौटा बेटा था. हल्की दाढ़ी वाले सागर के चेहरे पर दुख की जैसे एक काली छाया थी. उनकी पलकों के कोर पर आँसू टिके हुए थे.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

काफ़ी देर ख़ामोश रहने के बाद कांपती आवाज़ में बोले, "अभी पंद्रह जनवरी को बेटे का दूसरा जन्मदिन आने ही वाला था. हमने बर्थडे की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं. तभी अचानक बच्चे को निमोनिया की शिकायत उठी. पहले जब उसको खाँसी उठी तो हमने यहीं बारां में तुरंत डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने दवा देकर वापस भेज दिया और कहा सब ठीक है. लेकिन अगली सुबह बच्चे की तबीयत और ज़्यादा बिगड़ गई. अब हमें कोटा रेफ़र कर दिया गया. वहां अगले ही दिन मेरे बेटे ने दम तोड़ दिया".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

सागर और उनकी पत्नी हर्षिता के लिए अपने बेटे के साथ जेके लोन अस्पताल में बिताए 18 घंटे ज़िंदगी के सबसे मुश्किल और क्रूर घंटे हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

हर्षिता कहती हैं, "एक ही बिस्तर पर दो-दो बच्चे लेटे हुए थे. परिजनों को अंदर जाने नहीं दिया जा रहा था. उनके पास ऑक्सीजन सिलिंडर कम थे इसलिए एक ही सिलिंडर में दो नालियाँ लगाकर दो बच्चों को लगाई हुई थीं. और तो और, वार्ड के एक कर्मचारी ने मुझसे कहा कि मैं पानी में ऑक्सीजन की नली डुबो के देखूं, अगर बुलबुले उठे तो इसका मतलब है ऑक्सीजन चल रहा है. फिर ख़ुद ही बेटे को ऑक्सीजन दूँ. यह काम तो डॉक्टरों का है लेकिन वहां वार्ड में सब करने वाला कोई नहीं था. ऊपर से गंदगी इतनी. पूरे अस्पताल में सूअर घूमते थे".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

उस रात सिंह दम्पति के सामने से 4 अन्य बच्चों ने भी अपनी जान गँवा दी. बच्चे की अंतिम घंटों के बारे में बताते हुए सागर जोड़ते हैं, "आख़िरी घंटों में जैसे उसको डॉक्टरों से छोड़ दिया था. उसके हाथ में लगी ग्लूकोस की ड्रिप से उसकी हथेली सूज गयी थी. उन्होंने ड्रिप हटा दी लेकिन दोबारा किसी दूसरी जगह से नहीं लगाई. ऑक्सीजन भी हटा दिया. जाने से पाँच मिनट पहले तक वो हमसे बात कर रहा था. लेकिन जब 24 की शाम जब मेरा बेटा आख़िरी साँसे गिन रहा था तो डॉक्टरों के लिए वो जैसे खिलौना बन गया. वहां मौजूद दो डॉक्टर एक दूसरे से यही कहते रहे कि 'आप देखो-आप देखो'. तब तक चार बच्चे मर चुके थे इसलिए सब तनाव में थे. इसी बीच मेरा बेटा भगवान को प्यारा हो गया"मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

जेके लोन में बच्चों की मौतों का सिलसिला अभी थमा नहीं है. इन मौतों के कारण के साथ ही राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर पर आने से पहले पढ़िए शबाना की आपबीती.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

22 साल की शबाना से मेरी मुलाक़ात जेके लोन के प्रसूति वार्ड के भीतर हुई. सात महीने में पैदा हए उनके बेटे का वज़न सिर्फ़ एक किलो है. और यह रिपोर्ट लिखे जाने तक सिर्फ़ तीन दिनों का यह शिशु अस्पताल के नियो-नेटल इंटेसिव केयर यूनिट (एनआइससीयू या निकू) में ज़िंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

अस्पताल में शबाना से मिलने के बाद मैं पुराने कोटा के पाटनपोल मुहल्ले में उनके घर ढूँढते हुए उनके दरवाज़े पहुँची. घर पर उनके भाई आसिम और पति इमरान से मुलाक़ात हुई. "हमारे अब्बू बारात में बैंड बजाने का काम करते हैं. मैं वेल्डिंग करता हूं और शबाना के पति इमरान लोडिंग ऑटो चलाते हैं. घर के हालात ठीक नहीं लेकिन फिर भी हमने बहन के बेहतर इलाज की पूरी कोशिश की".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

शबाना की शादी मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में हुई है और अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए वह कुछ ही हफ़्ते पहले कोटा आई थीं. लेकिन खून की कमी और प्री-टर्म डिलिवरी के बाद पैदा हुए उनके 'लो बर्थ वेट (एलबीडब्ल्यू) या 'कम वजन के बच्चे' के लिए ज़िंदगी का हर घंटा संघर्ष से कम नहीं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

नियोनेटल डेथ या नवजात शिशुओं की मृत्यु
रेखा, हर्षिता और शबाना - राजस्थान की इन तीनों माँओं की कहानियों में परिवारों की आर्थिक पृष्ठभूमि का कमज़ोर होना एक समानता है. वहीं दूसरी ओर समय से पहले प्रसव, कम वज़न के नवजात का जन्म और राज्य में चिकित्सा की तीन स्तरीय प्रणाली का ठीक से काम न करना भी नवजातों की जान खतरे में डालने वाले महत्वपूर्ण कारण हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

नियोनेटल डेथ या नवजात बच्चों की मृत्यु का कारण जन्म संबंधी जटिलताएं, सेप्सिस, इंफेक्शन, डायरिया, सांस लेने में दिक्कत, प्रीमैच्योर जन्म, हैपोथेरमिया और कम वजन से जुड़ी समस्याओं में से कुछ भी हो सकता है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

आँकड़े क्या कहते हैं..
लंबे समय से बच्चों के स्वास्थ से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह कोटा की घटना को राष्ट्रीय परिपेक्ष में रखते हुए कहते हैं, "कोटा के अस्पताल की जो कहानी है वह यूपी, बिहार और उत्तर भारत के हर सरकारी अस्पताल का सच है. चाहे वह गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज हो, झारखंड का रिम्स हो गुजरात का राजकोट. हर बड़े अस्पताल में नियोनेटल, इंफैन्ट डेथ बहुत ज़्यादा है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

यूनिसेफ के साथ-साथ एनएचएफएस या नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट में भी उत्तर भारत के राज्यों में बच्चों की बड़ी संख्या में मौतों के शर्मनाक आंकड़े दर्ज हैं. 0 से 7 दिन के अंदर पूरे देश में हर एक हजार बच्चों पर 23 बच्चे मर जाते हैं. इसी तरह 7 दिन से 29 दिन के अंदर एक हज़ार बच्चों में से 24 बच्चों की जान चली जाती है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

पाँच वर्ष के भीतर जान गंवाने वाले इन बच्चों की संख्या प्रति हज़ार 39 है. केरल, गोवा, मेघालय, मिजोरम जैसे राज्यों में यह 10 से भी कम है. जबकि राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यह आकंडा 50 से शुरू होकर 78 तक जाता है".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

बदहाल चिकित्सा प्रणाली
नवजातों और बच्चों की बढ़ती मौतों की पड़ताल के लिए बीबीसी ने कोटा के सटे बारां जिले में चल रही तीन स्तरीय चिकित्सा प्रणाली का दौरा किया. सहरिया आदिवासियों की बड़ी जनसंख्या वाले बारां ज़िले के कई नवजातों के नाम, जेके लोन में गुज़रे बच्चों की फ़ेहरिस्त में शामिल हैं. इस रिपोर्ट में शामिल रेखा और हर्षिता के बच्चे इसी जिले में जन्मे थे.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

पड़ताल की शुरुआत हमने रेखा और टोनू के गांव में मौजूद उप-स्वास्थ केंद्र से की. गर्भवती महिलाओं की जाँच, प्रसव की सुविधा के साथ-साथ बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ देने के लिए बने इस स्वास्थ्य केंद्र पर ताला पड़ा था और इसकी खिड़कियाँ फूटी हुई थीं. ग्रामीणों ने बताया कि यह अक्सर बंद ही रहता है और इसके होने से उन्हें कोई विशेष फ़ायदा नहीं हुआ.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

इसके बाद हम बढ़े बारां के कोयला गांव में पड़ने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तरफ. अस्पताल के प्रांगण में खड़े घने नीम के पेड़ों के नीचे एक एंबुलेंस तो खड़ी थी लेकिन अस्पताल में न ही कोई प्रसूति विशेषज्ञ नियुक्त था और न ही कोई बाल रोग विशेषज्ञ.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

स्वास्थ केंद्र के सुपरवाइज़र शंकर लाल बहरवा ने बीबीसी को बताया की आसपास के 15 गाँवों ले लोग इस अस्पताल पर अपने प्राथमिक इलाज के लिए निर्भर हैं. "वैसे तो दो डॉक्टर हैं यहां लेकिन अभी वो दोनों ही अपनी आगे की पढ़ाई की परीक्षा देने कोटा गए हैं. विशेषज्ञ यहां नहीं है इसलिए सभी बड़े मामलों को आगे रेफ़र कर दिया जाता है".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

कोयला गांव से आगे हम पहुंचे मांगरोल सामुदायिक स्वास्थ केंद्र. इस अस्पताल में बिना किसी सर्जन, एनेस्थिसिस्ट, प्रसूति विशेषज्ञ, बालरोग विशेषज्ञ और हड्डी रोग विशेषज्ञ के व्यवस्था चला रहे डॉक्टर सौभाग्यमल मीणा धँस रही सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की जीती जागती तस्वीर हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर सौभाग्यमल मीणा कहते हैं, "यहां 1100-1200 की ओपीडी देखने के लिए कई बार हम सिर्फ़ दो डॉक्टर होते हैं. विशेषज्ञ कोई नहीं है लेकिन नर्सों और सहायक स्टाफ़ की मदद से डिलिवेरी करवानी पड़ती हैं".मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

जेके लोन में हुई मौतों के बारे में बात करते हुए वह जोड़ते हैं, "यहां किशनगढ़ और आसपास सहरिया आदिवासियों की बड़ी बस्तियाँ हैं. साथ ही मध्य प्रदेश का पन्ना सिर्फ़ 30 किलीमीटर दूर हैं यहां से...वहां से भी मरीज़ आते हैं. इन इलाक़ों में शिक्षा और जागरूकता की कमी है. गर्भवती महिलाओं की सतत जाँच नहीं करवायी जाती और कई बार सीधे दर्द उठने पर महिला को अस्पताल लाया जाता है. कम उम्र में गर्भ ठहरने और माँ के कुपोषित होने या खून की कमी होने पर अक्सर प्री-टर्म डिलिवेरी करवाने की नौबत आ जाती है". मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह